राफेल सौदे में रिपोर्ट का दावा: सरकार ने भ्रष्टाचार रोकने के नियमों को हटा दिया था…

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राफेल विमान सौदे को लेकर सोमवार को हुए एक बड़े खुलासे के बाद कांग्रेस पार्टी ने सवाल किया है कि आखिर ‘ऐसा करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कौन सा भ्रष्टाचार छिपाना चाहते थे?’

द हिंदू में सोमवार को प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया है कि राफेल सौदे पर हस्ताक्षर से कुछ दिन पहले मानक रक्षा खरीद प्रक्रिया में बदलाव करते हुए भ्रष्टाचार विरोधी कुछ मुख्य प्रावधानों को हटा दिया गया था।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी पीएम मोदी पर सीधे निशाना साधते हुए कहा कि उन्होंने लूट कराई है। राहुल ने कहा, “हर रक्षा सौदे में भ्रष्टाचार विरोधी धाराएं होती हैं। द हिंदू ने खबर दी है कि पीएम ने भ्रष्टाचार विरोधी खंड हटा दिया। यह साफ है कि पीएम ने लूट में सहायता की।

कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने अंग्रेजी अखबार ‘द हिंदू’ की एक खबर शेयर करते हुए ट्वीट किया, ‘मोदी जी, राफेल सौदे में सॉवरन गारंटी माफ करने के बाद अपने भ्रष्टाचार विरोधी प्रावधान में भी छूट दे दी। आखिर आप कौन सा भ्रष्टाचार छिपाना चाहते थे?”

पार्टी के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने कहा, ‘सरकार ने जितना सोचा नहीं था, उससे ज्यादा तेजी से राफेल सौदे में खुलासे हो रहे हैं।’

उन्होंने कहा कि पहले कीमत बढ़ाई गई, फिर यह खुलासा हुआ कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने समानांतर बातचीत करके भारतीय वार्ता दल के प्रयासों को कमजोर किया। अब यह खुलासा हुआ है कि मानक रक्षा खरीद प्रक्रिया के प्रावधानों में बदलाव किए गए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि दसाल्ट को इस सौदे में फायदा ही फायदा हुआ है।

गौरतलब है कि अखबार की खबर में कहा गया है कि फ्रांस के साथ इस सौदे के समझौते पर दस्तख्त करने से चंद दिन पहले ही सरकार ने इसमें भ्रष्टाचार के खिलाफ पेनाल्टी से जुड़े अहम प्रावधानों को हटा दिया था।

कांग्रेस राफेल विमान सौदे में भ्रष्टाचार का आरोप लंबे समय से लगा रही है, हालांकि सरकार ने इसे सिरे से खारिज करती रही है।
द हिंदू की रिपोर्ट में क्या है?
भारत और फ्रांस के बीच 7.5 बिलियन यूरो में किए गए राफेल विमान के सौदे में भारत सरकार की ओर से बड़ी और अभूतपूर्व रियायतें दी गई थीं। अंतर सरकार समझौता (आइजीए) पर हस्ताक्षर करने से कुछ दिन पहले भ्रष्टाचार रोधी जुर्माना के लिए महत्वपूर्ण प्रावधानों और एक एस्क्रॉ अकाउंट के जरिये भुगतान करने की शर्तों को हटा दिया गया था।

नरेंद्र मोदी सरकार के लिए इसके महत्वपूर्ण राजनीतिक निहितार्थ हैं। जिन्होंने दावा किया कि भ्रष्टाचार को खत्म करना शासन के लिए उनके एजेंडे का एक प्रमुख मुद्दा है, और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के दौरान हुए रक्षा सौदों में कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का वादा किया था।

आपके लिए खासः
अंग्रेजी अखबार द हिंदू का दावा है कि उनके पास मौजूद आधिकारिक दस्तावेज में यह उल्लेखित है कि तत्कालीन रक्षामंत्री मनोहर परिकर की अध्यक्षता में रक्षा अधिग्रहण परिषद ने 2016 में अंतर सरकार समझौता, आपूर्ति प्रोटोकॉल, ऑफसेट अनुबंध और ऑफसेट शेड्यूल में आठ बदलावों को “परिवर्तन और अनुमोदित” किया।

वाइस एडमिरल अजीत कुमार द्वारा हस्ताक्षरित एक नोट में कहा गया है: “आपूर्ति प्रोटोकॉल में ‘अनुचित प्रभाव के लिए दंड, एजेंट्स /एजेंसी कमीशन’, और ‘कंपनी खातों तक पहुंच’ से संबंधित मानक डीपीपी के नियम से हटाए जाएं।”

यह महत्वपूर्ण है कि फ्रांस की सरकार के साथ की जा रही प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की “समानांतर वार्ताओं” पर द हिंदू द्वारा प्रकाशित इस जानकारी और न ही अन्य महत्वपूर्ण जानकारियों को, सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पेश की गई सामग्री में शामिल नहीं किया।

उच्च-स्तरीय राजनीतिक हस्तक्षेप का मतलब था कि मानक रक्षा खरीद प्रक्रिया (डीपीपी) से डसॉल्ट एविएशन और एमबीडीए फ्रांस के “अनुचित प्रभाव, एजेंट्स / एजेंसी कमीशन, और कंपनी खातों तक पहुंच के लिए दंड” के नियम को भारत सरकार ने आपूर्ति प्रोटोकॉल से हटा दिया।

23 सितंबर 2016 को दिल्ली में भारत और फ्रांस के बीच हस्ताक्षरित अंतर सरकार समझौता (आइजीए) की शर्तों के तहत, डसॉल्ट राफेल विमान पैकेज का आपूर्तिकर्ता है जबकि एमबीडीए फ्रांस भारतीय वायु सेना के लिए हथियार पैकेज का आपूर्तिकर्ता है।

आइजीए में आठ बदलाए किए गए द हिंदू के पास मौजूद आधिकारिक दस्तावेज बताते हैं कि तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर परिकर की अध्यक्षता में रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) ने सितंबर 2016 में मुलाकात की, और अंतर सरकार समझौता (आइजीए), आपूर्ति प्रोटोकॉल, ऑफसेट अनुबंध और ऑफसेट शेड्यूल में आठ बदलावों को “परिवर्तन और अनुमोदित” किया। यह 24 अगस्त 2016 को प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में रक्षा सौदों की कैबिनेट समिति (सीसीएस) की आईजीए और संबंधित दस्तावेजों को सहमति दिए जाने के बाद किया गया था।

इन आठ बदलावों में सबसे अहम बदलाव उप-पैरा (सी) में किया गया, जो वाइस एडमिरल अजीत कुमार द्वारा हस्ताक्षरित एक नोट में दर्ज है। अजित कुमार डीसीआईडीएस (पीपी एंड एफडी) और डीएसी के सदस्य-सचिव थे। इसमें कहा गया है: “आपूर्ति प्रोटोकॉल में ‘अनुचित प्रभाव के लिए दंड, एजेंट्स / एजेंसी कमीशन’, और ‘कंपनी खातों तक पहुंच’ से संबंधित मानक डीपीपी के नियम से हटाए जाएं।”

यह बेहद महत्वपूर्ण है कि भारत सरकार द्वारा आपूर्ति प्रोटोकॉल से इन नियमों को हटा दिया गया था। जबकि अंतर सरकार समझौता (आइजीए) भारत और फ्रांस की सरकारों के बीच बड़ा समझौता था, और दो निजी कंपनियों डसॉल्ट और एमबीडीए को आपूर्ति प्रोटोकॉल का पालन करना था।

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