ज्योतिबा फुले से लेकर मायावती तक, कुछ ऐसा रहा दलित हक का संघर्ष

‘कानून के अमल के मामले में हमारा अनुभव बहुत ही बुरा है. अधिकतर मामलों में कानून का उपयोग पिछड़ी जाति के लोगों के खिलाफ हुआ है. ऊंची जाति के सभी हिन्दू नीची जाति के लोगों को गन्दा काम करने पर मजबूर करते हैं, वो सोचते हैं कि अगर अछूत ये काम करना छोड़ देंगे, तो उनका जीवन स्तर सुधरने लगेगा और वो सवर्णों की हर स्तर पर बराबरी करेंगे.’ बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के शब्द दलित उत्पीड़न की दास्तान कह रहे हैं.

ये संघर्ष हजारों साल पुराना है और लड़ाई अब भी जारी है. इंसान-इंसान में फर्क करने वाली सामाजिक संरचना तैयार होते ही एक तबका वक्त के हाशिए पर धकेल दिया गया. तब ये अस्पृश्य यानी अछूत कहलाते थे और अब इन्हें दलित कहा जाता है. आज दलित सड़क पर उतरकर अपनी ताकत का एहसास करा रहे हैं, लेकिन संघर्ष की ये कहानी तो उस दौर से शुरू होती है जब दलितों को उन रास्तों से भी गुजरने की इजाजत नहीं थी, जिससे ऊंची जातियों के लोग गुजरते थे.

1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना करने वाले पुणे के ज्योतिराव फुले वो पहले शख्स थे, जिन्होंने दलितों को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें शिक्षित करने पर जोर दिया. ये बात आज भले ही छोटी लगे लेकिन जिस वक्त ज्योतिबा ने ये लड़ाई शुरू की थी. उन्हें ऊंची जातियों के अलावा अपने लोगों का भी विरोध झेलना पड़ा था. क्योंकि ज्योतिराव फुले ने किताबों को उन लोगों के हाथों में पहुंचाने की हिम्मत दिखाई थी, जिन्हें सिर्फ मजदूरी करने, मैला ढोने और ऊंची जाति के लोगों की सेवा करने के लिए जाना जाता था.

छोटी जाति की महिलाओं के लिए स्कूल खोले जाने के मौके पर ज्योतिबा फुले ने कहा था कि–

ज्योतिबा फुले ने सिर्फ समाज के कमजोर, शोषितों और मजदूरों को पढ़ाने पर ही जोर नहीं दिया बल्कि अपनी पत्नी सावित्री बाई फुले के साथ मिलकर लड़कियों को भी अपनी उम्र के लड़कों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर स्कूल तक आने के लिए प्रेरित कर दिया. उन्होंने महाराष्ट्र में महिलाओं के लिए पहला स्कूल खोला, जो भारत में भी महिलाओं का पहला स्कूल था. सावित्रीबाई फुले घर से बाहर निकलकर पढ़ाने वाली पहली महिला थीं.

ज्योतिबा फुले ने अगर दलितों को उनके अधिकार का एहसास कराया तो उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का काम डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने किया. दरअसल, जिस समाज में भीमराव आंबेडकर ने जन्म लिया था, वहां दलितों से हो रहे भेदभाव को देखते हुए वो बड़े हुए थे. ये वो दौर था जब दलितों को गांव के सबसे आखिरी छोर पर ही अपना घर बनाने की इजाजत थी. वो पीने के लिए उस कुएं से पानी नहीं ले सकते थे, जहां से ऊंची जातियों के लोग पानी पीते थे. महिलाएं ऊंची जातियों के घरों में साफ-सफाई का काम करती थीं.

जिस महार जाति से आंबेडकर ताल्लुक रखते हैं, कहा जाता है कि उन्हें अपनी कमर के पीछे झाड़ू बांधकर चलना होता था ताकि रास्ते से उनके पैरों के निशान मिट जाएं और वो फिर से ऊंची जातियों के चलने लायक हो जाए. छूआछूत और भेदभाव के इस माहौल में दलितों को बराबरी का हक दिलाने के लिए डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने 1924 में महार आन्दोलन की शुरुआत की. ज्योतिबा फुले से एक कदम आगे बढ़ते हुए उन्होंने देश में सबसे पहले दलितों के लिए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों की पैरवी की. इसके लिए डॉक्टर आंबेडकर ने 1924 में वंचित वर्ग संस्थान की स्थापना की. 1927 में बहिष्कृत भारत नाम से मराठी पत्रिका निकालनी शुरू की. 1956 में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया की स्थापना की.

जानकारों के मुताबिक आर्थिक और सामाजिक और पर पिछड़े लोगों के लिए दलित शब्द के इस्तेमाल को संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने ही बढ़ावा दिया, लेकिन दलित शब्द का प्रयोग सबसे पहले किसने किया, इसका जवाब कोई भी दावे के साथ नहीं दे सकता. दलित का शाब्दिक अर्थ- दमित, शोषित, कुचला हुआ माना जाता है. 1927 में महात्मा गांधी ने एक गुजराती लेख में दलित शब्द का जिक्र किया था. 1929 में लिखी एक कविता में कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने भी ‘दलित’ शब्द का इस्तेमाल किया था.

दलित के अलावा महात्मा गांधी समाज के शोषित तबके के लिए हरिजन शब्द का भी इस्तेमाल करते थे. छूआछूत और भेदभाव खत्म करने के लिए गांधी हरिजन नाम से तीन अखबार निकालते थे. गुजराती में हरिजन बन्धु, हिन्दी में हरिजन सेवक और अंग्रेजी में हरिजन के जरिए गांधी जी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लेख लिखते थे लेकिन अब संविधान के मुताबिक हरिजन शब्द को अमान्य कर दिया गया है.

महात्मा गांधी ने समाज के शोषित तबके को सम्मान देने के मकसद से उन्हें हरिजन कहना शुरू किया इसके पीछे मंशा हरिजन यानी भगवान के लोग कहने की थी लेकिन बाद में दलित समाज के लोगों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया. दरअसल, दक्षिण भारत के देवालयों में जहां देवदासी प्रथा है, वहां देवदासियों के नाजायज बच्चों को हरिजन कहने की प्रथा थी.

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जब डॉक्टर आंबेडकर ने संविधान का निर्माण किया तो दलितों के लिए उन्होंने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति शब्द का इस्तेमाल किया लेकिन दलित शब्द को सबसे ज्यादा लोकप्रिय बनाने में बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम का योगदान अहम माना जाता है. आज देश के सामने दलित समाज का जो चेहरा हमारे सामने है, उसे गढ़ने वाले कांशीराम ही हैं. 1984 में बहुजन समाज पार्टी की स्थापना करने वाले कांशीराम ने दलित समाज को नई पहचान देते हुए उसे बहुजन समाज कहा. बहुजन समाज में तमाम अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जातियों, पिछड़ा वर्ग, अन्य पिछड़ा वर्ग और धार्मिक अल्पसंख्यकों को एक साथ लाने की कोशिश की गई.

दलित आंदोलन को आगे बढ़ाने वाले ज्योतिबा फुले ने दलितों को उनके अधिकारों का एहसास कराया, डॉक्टर आंबेडकर ने बराबरी के अधिकार देने की पहल की और कांशीराम ने इससे भी एक कदम आगे बढ़कर दलितों को अपनी ताकत एकजुट करने के लिए प्रेरित किया और ये ताकत थी उनके वोटों की. कांशीराम दलितों के मन में ये बात बिठाने में कामयाब रहे कि समता मांगने से या अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहने से नहीं मिलेगी. ये मिलेगी राजनीतिक ताकत से लेकिन राजनीतिक रूप से दलितों को एकजुट करने से पहले कांशीराम ने अलग-अलग मुद्दों पर, अलग-अलग क्षेत्रों में बंटे दलितों को एक सूत्र में बांधने का काम किया और इसके तहत उन्होंने 1978 में बामसेफ की स्थापना की जो आज तक काम कर रहा है.

BAMCEF दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक कर्मचारियों का अखिल भारतीय संगठन है. BAMCEF का मतलब अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ी जातियां और अल्पसंख्यक कर्मचारी कल्याण संघ है. इस संगठन को देश में फैले गैरबराबरी के हालात के खिलाफ लड़ने के मकसद से तैयार किया गया था. इस संगठन की स्थापना के साथ ही पढ़े-लिखे युवा इससे जुड़ने लगे. दरअसल, बामसेफ एक ऐसा गैर-राजनीतिक, गैर-आंदोलनकारी और गैर-धार्मिक संगठन था, जिससे समाज का हर वो शख्स जुड़ना चाहता था, जो तत्कालीन सामाजिक ढांचे में बराबरी का अधिकार पाने के लिए छटपटा रहा था. बामसेफ ने हिंदुस्तान के अलग-अलग इलाकों में रह रहे 6000 से ज्यादा जातियों को सोच और मकसद के एक धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया.

यही वो मोड़ था जब देश में एक नई राजनीतिक व्यवस्था अंगड़ाई लेने लगी थी. दलितों को अपनी ताकत का एहसास होने लगा था. कांशीराम मानते थे कि मनुवादी सामाजिक व्यवस्था को तोड़ने के लिए बहुजन को एक साथ आना चाहिए. इसलिए 1981 से उन्होंने DS-4 के तले बहुजनों को संगठित करने का काम शुरू किया. DS-4 का मतलब था दलित शोषित समाज संघर्ष समिति इसका मुख्य नारा था- ठाकुर, ब्राह्मण, बनिया छोड़, बाकी सब हैं डीएस-4.

DS-4 कोई राजनीतिक मंच नहीं था, लेकिन इसके जरिए कांशीराम ने दलितों और अल्पसंख्यकों की राजनीतिक गोलबंदी शुरू कर दी थी. डीएस-4 के तहत कांशीराम ने बड़े पैमाने पर जनसंपर्क अभियान चलाया, जिसमें मायावती ने उनका बढ़-चढ़कर साथ दिया. उन्होंने एक साइकिल मार्च निकाला, जिसने सात राज्यों में तकरीबन 3,000 किलोमीटर की यात्रा की. DS-4 ने 1982 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में 46 निर्दलीय उम्मीदवारों को चुनाव में उतारा था.

इसके बाद 1983 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी DS-4 ने जोर आजमाइश की. भले ही चुनाव में DS-4 को गिनाने लायक कामयाबी नहीं हासिल हुई, लेकिन इसने दलितों को राजनीतिक तौर पर एक मंच पर ला दिया था. इसके बाद 14 अप्रैल, 1984 को कांशीराम ने एक राजनीतिक संगठन बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की. 2001 में कांशीराम ने मायावती को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. मायावती ने कांशीराम को राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए दलितों के साथ दूसरी सवर्ण जातियों को जोड़कर हिंदुस्तान की राजनीति में सोशल इंजीनियरिंग का नायाब फॉर्मूला गढ़ा और दूसरी पार्टियों को भी अपनी राजनीतिक जोड़-तोड़ में दलित वोटों की चिंता करने पर मजबूर कर दिया.

अगर, उत्तर में आज सामाजिक आंदोलनों के गर्भ से निकली राजनीतिक व्यवस्था अपनी जड़ें जमा रही है, तो उधर दक्षिण में भी मौजूदा राजनीति, सुधारवादी आंदोलनों से उपजी सोच को भुनाने में लगी है. यही वजह है कि दक्षिण भारत में सुधारवादी आंदोलन के सबसे बड़े प्रणेता रहे पेरियार अब भी राजनीति के केंद्र बिंदु बने हुए हैं.

दक्षिण भारत में इरोड वेंकट नायकर रामासामी पेरियार को दलित मसीहा का दर्जा दिया जाता है. पेरियार को द्रविड़ राजनीति का जनक कहा जाता है. तमिल में पेरियार का मतलब सम्मानित व्यक्ति होता है. पेरियार ने ब्राह्मणवाद के खिलाफ आन्दोलन की नींव रखी. उन्होंने मंदिरों में दलितों के प्रवेश के लिए बड़ा आन्दोलन खड़ा किया.

दक्षिण में दलितों की स्थिति बेहतर करने के लिए पेरियार ने कौन-कौन से अहम अभियान चलाए. पेरियार ने 1973 में दुनिया को अलविदा कह दिया था. अब पेरियार का नाम वोट मांगने और प्रतिकात्मक राजनीति करने के काम आता है. फिलहाल उत्तर से लेकर दक्षिण तक देश में दलितों के नाम पर प्रतीकों की राजनीति जोर पकड़ रही है. कोई दलितों के घर भोजन करके सामाजिक समरसता का संदेश देना चाहता है, तो कोई मूर्तियों को नुकसान पहुंचाकर दलितों को लेकर सदियों से चली आ रही मानसिकता का इजहार कर रहा है.

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