SC/ST एक्‍ट: केंद्र की पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का फिलहाल फैसला बदलने से इनकार

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नई दिल्लीः एससी-एसटी ऐक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के संदर्भ में केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका पर ओपन कोर्ट पर सुनवाई शुरू हो गई है. केंद्र की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह ऐक्ट के खिलाफ नहीं है लेकिन निर्दोषों को सजा नहीं मिलनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जो लोग सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं उन्होंने हमारा फैसला पढ़ा भी नहीं है. हमें उन निर्दोष लोगों की चिंता है जो जेलों में बंद हैं. फिलहाल इस मामले में सुनवाई चल रही है. सुप्रीम कोर्ट ने फैसला बदलने से इनकार कर दिया. सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर 10 दिन बाद सुनवाई करेगा. सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों से दो दिन में जवाब मांगा.

सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि देश में इमरजेंसी जैसे हालात हैं. हजारों लोग सड़कों पर उतर आए हैं. केंद्र ने कहा कि शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए याचिका पर जल्द सुनवाई हो. केंद्र की इस दलील के बाद सुप्रीम कोर्ट मामले की सुनवाई के लिए तैयार हो गया है. मामले की खुली अदालत में सुनवाई हो रही है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह SC/ST एक्‍ट के खिलाफ नहीं है पर निर्दोषों को सजा नहीं मिलनी चाहिए.

कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि सरकार पूरी क्षमता के साथ सर्वोच्च न्यायालय में इस मुद्दे पर बहस करेगी. उन्होंने इस मुद्दे का राजनीतिकरण करने के लिए कांग्रेस पर हमला किया. उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार हमेशा से उपेक्षित वर्ग के समर्थन में रही है और भाजपा ने ही देश को दलित राष्ट्रपति दिया है.

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सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को आदेश दिया था कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम के अंतर्गत आरोपी को तत्काल गिरफ्तार करना जरूरी नहीं होगा. प्राथमिक जांच और सक्षम अधिकारी की स्वीकृति के बाद ही दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी. केंद्र सरकार सोमवार को कहा था कि SC/ST एक्ट की जिस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया हैं उसमें सरकार पार्टी नहीं थी, जबकि संसद ने कानून बनाया था. केंद्र ने कहा कि कानून बनाना संसद का काम है. सरकार का मानना हैं कि 3 तथ्यों के आधार पर ही सुप्रीम कोर्ट कानून को रद्द कर सकता है. अगर मौलिक अधिकार का हनन हो, कानून गलत बनाया गया हो या कोई कानून बनाने का अधिकार संसद के अधिकार क्षेत्र में आता नहीं हो.

सरकार की ये भी दलील है कि कोर्ट ये नहीं कह सकता है कि कानून का स्वरूप कैसा हो क्योंकि कानून बनाने का काम संसद का है. साथ ही किसी भी कानून को सख्त बनाने का अधिकार भी संसद के पास ही है. वहीं केंद्र ने ये भी कहा कि समसामयिक जरूरतों की की पूर्ति के लिए कैसा कानून बने ये संसद या विधानसभा तय करती है.

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