लखनऊ विकास प्राधिकरण में तबादला नीति पर सवाल।
लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) में मुख्यमंत्री की ज़ीरो टॉलरेंस और पारदर्शिता नीति के तहत प्रवर्तन सेल में अधिकारियों और अभियंताओं के नियमित फेरबदल की रणनीति बनाई गई थी।
उद्देश्य यह था कि किसी एक क्षेत्र में लंबे समय तक तैनाती से पनपने वाले भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके।
प्राधिकरण उपाध्यक्ष द्वारा तैयार की गई इस नीति के अंतर्गत ऊपर और नीचे दोनों स्तरों पर कार्यरत अभियंताओं एवं ज़ोनल अधिकारियों को समय-समय पर बदले जाने के निर्देश दिए गए थे।
- लेकिन आरोप है, कि प्राधिकरण के मुख्य अभियंता के स्टाफ ने कथित रूप से कूट रचना करते हुए उपाध्यक्ष के आदेशों की अवहेलना की और उन्हीं अभियंताओं को दोबारा उन्हीं ज़ोनों में तैनात कर दिया, जहां से उन्हें पूर्व में अनियमितताओं की शिकायतों के बाद हटाया गया था।
सूत्रों के अनुसार, अवर अभियंता विपिन राय को तीसरी बार ज़ोन–1 में तैनाती दी गई है। इसी क्रम में ज़ोन–3 में तैनात सहायक अभियंता रवि शंकर राय जो पूर्व मे यहाँ अवर अभियंता रह चुके हैं, अवर अभियंता राहुल विश्वकर्मा और शिवानंद शुक्ला—तीनों को एक साथ ज़ोन–1 में तैनात कर दिया गया।
इसे लेकर विभागीय स्तर पर “जुगलबंदी” को संरक्षण दिए जाने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं।
वहीं, अवर अभियंता प्रमोद पांडे और विभोर श्रीवास्तव को दूसरी बार ज़ोन–2 में तैनाती मिली है। उल्लेखनीय है कि प्रमोद पांडे को इसी ज़ोन से पहले अनियमिताओं के आरोप मे हटाया गया था, हटाने के बाद शासन द्वारा उन्हें चित्रकूट जनपद में स्थानांतरित किया गया था, लेकिन कथित जुगाड़ के माध्यम से वे पुनः लखनऊ विकास प्राधिकरण में लौट आए और प्रवर्तन जैसे कमाई वाले प्रकोष्ठ में तैनाती भी हासिल कर ली।
इसके अतिरिक्त, राम चौहान को दूसरी बार ज़ोन–3, अवर अभियंता विवेक पटेल और सहायक अभियंता अनूप श्रीवास्तव को दूसरी बार ज़ोन–4 तथा सहायक अभियंता संजय शुक्ला को दूसरी बार ज़ोन–7 में तैनाती दिए जाने की जानकारी सामने आई है।
इन तबादलों को लेकर विभाग के भीतर ही सवाल उठने लगे हैं कि जब अनियमितताओं की शिकायतों के आधार पर अधिकारियों को हटाया गया था, तो उन्हें पुनः उन्हीं ज़ोनों में भेजने के पीछे क्या मंशा है।
LDA में चल रहा यह ‘प्रत्यावर्तन’ (सर्कुलेशन) का खेल केवल तबादलों का मामला नहीं है, बल्कि एक गहरे प्रशासनिक भ्रष्टाचार का संकेत है। यदि उपाध्यक्ष की रणनीति को मुख्य अभियंता के कार्यालय द्वारा विफल किया जा रहा है, तो यह उच्च-स्तरीय जांच का विषय है।
अब यह देखना अहम होगा कि प्राधिकरण उपाध्यक्ष इस पूरे प्रकरण पर क्या रुख अपनाते हैं और मुख्यमंत्री की घोषित नीति के अनुरूप व्यवस्था में पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित की जाती है।
