लखनऊ विकास प्राधिकरण में आंतरिक तैनाती का खेल
‘मनचाही पोस्टिंग’ के लिए तय रेट, नियमावली लगभग बेअसर
(पार्ट–1)
लखनऊ।
लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) के अधिष्ठान प्रकोष्ठ को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। यही वह प्रकोष्ठ है, जहां से विभाग के भीतर कर्मचारियों का आंतरिक फेरबदल होता है, लेकिन सूत्रों की मानें तो यहां व्यवस्था नियमों से नहीं, बल्कि “रेट लिस्ट” से चलती है।
सूत्रीय जानकारी के अनुसार चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी और कनिष्ठ लिपिक अपनी सुविधा और कमाई की संभावनाओं के आधार पर एक प्रकोष्ठ से दूसरे प्रकोष्ठ में ऐच्छिक नियुक्ति करा लेते हैं। बताया जाता है कि जिस प्रकोष्ठ में जितनी “कमाई” की संभावना होती है, वहां नियुक्ति का रेट भी उतना ही अधिक तय होता है। नियमावली का पालन यहां लगभग नगण्य बताया जा रहा है।
कर्मचारियों के बीच यह आम चर्चा है कि यदि किसी प्रकोष्ठ में “ऊपरी आय” नहीं है, तो वहां अधिक समय रुकने का कोई कारण नहीं। कई कर्मचारी खुले तौर पर यह कहते पाए गए कि वे कुछ समय के लिए “कमाई वाले” प्रकोष्ठ में जाएंगे और कुछ ही समय बाद वास्तव में उन्हें वहां तैनाती भी मिल जाती है।
भ्रष्टाचार के इस कथित तंत्र को समझने के लिए पूर्व प्राधिकरण उपाध्यक्ष इंद्रमणि त्रिपाठी का एक आदेश उल्लेखनीय है। उनके कार्यकाल में प्रवर्तन विभाग के तत्कालीन सुपरवाइजरों पर अनियमितताओं के आरोप सामने आए थे, जिसके बाद उन्हें प्रवर्तन कार्य से हटाकर अन्य प्रकोष्ठों में तैनात कर दिया गया था।
हालांकि, उनके स्थानांतरण के बाद इन सुपरवाइजरों ने कथित रूप से चालाकी से प्रवर्तन ज़ोन के समानांतर ज़ोन की सिविल इकाई में अपना स्थानांतरण करा लिया। आरोप है कि सिविल इकाई में रहते हुए भी वे अधिकांश समय अपने पसंदीदा ज़ोन में प्रवर्तन का कार्य करते रहे। इस दौरान किसी भी संबंधित उच्च अधिकारी ने यह पूछने की आवश्यकता नहीं समझी कि वे दिन भर सिविल इकाई से कहां और किस कार्य में संलग्न रहते हैं।
बताया जाता है कि नए उपाध्यक्ष ने इनके स्थान पर पार्कों के रख-रखाव से जुड़ी समिति के कर्मचारियों को हटाकर प्रवर्तन विभाग में तैनात कर दिया और उन्हें डाक वितरण जैसे कार्यों में लगा दिया। इससे प्रवर्तन के अवर अभियंताओं को व्यवहारिक समस्याएं आने लगीं और समिति से आए कर्मचारियों को “अनाड़ी” बताकर फिर से उन्हीं हटाए गए, कथित उगाही विशेषज्ञ सुपरवाइजरों की सेवाएं ली जाने लगीं।
प्राधिकरण के प्रवर्तन सेल में कुल सात ज़ोन हैं। आरोप है कि पूर्व उपाध्यक्ष द्वारा हटाए गए ये सुपरवाइजर बाद में पूरे मनोवेग से इन ज़ोनों में सक्रिय हो गए और अनाधिकृत निर्माणों से जमकर उगाही कर उन्हें संरक्षण देने लगे। इस कथित व्यवस्था से न केवल वे स्वयं, बल्कि उनसे जुड़े अवर अभियंता भी लाभान्वित होते रहे।
सूत्र बताते हैं कि इन सुपरवाइजरों में से कई के पास निजी कारें हैं और वे दबंगई के साथ कारों से प्राधिकरण कार्यालय आते-जाते हैं, जबकि उनका आधिकारिक वेतन सामान्यतः 40 से 50 हजार रुपये के बीच बताया जाता है। यदि भ्रष्टाचार निवारण विभाग द्वारा निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो कई सुपरवाइजर आय से अधिक संपत्ति के दायरे में आ सकते हैं।
इन कथित उगाही विशेषज्ञ सुपरवाइजरों के नामों सहित और विस्तृत खुलासे जारी रहेंगे।