पत्रकारों का जिन्ना कहीं है, गोडसे भी ज़िन्दा है

# संवाददाता समिति के बंटवारे के हौसले बढ़े

# हेमंत गुट-प्रांशु गुट की वैद्यता पर सरकार ने लगायी मोहर

# एक से दो हुए, अब दो से चार हो सकते है

# एकता के लिए सरकार ने किये थे सराहनीय प्रयास

# मध्यस्थता के बजाय पत्रकार नेताओं ने पत्रकारों की गुटबंदी पर मोहर लगवा दी

# आम पत्रकारों को दूर रखकर बंटवारा स्थायित्व कर रहे थे मठाधीश पत्रकार

# गुपचुप तरीके से भेजे गये थे मान्यता कमेटी के लिए नाम

# नियमानुसार कार्यकारिणी की सहमति के बिना वैध नही हो सकती कोई कार्रवाई

यूपी के पत्रकारों को योगी सरकार का शुक्रिया अदा करना चाहिए है। काफी अर्से बाद यूपी प्रेस मान्यता समिति में पत्रकारों की नुमाइंदगी शामिल की गई। पत्रकार मित्रों को नहीं पता होगा, सरकार चाहती थी कि पत्रकारों की गुटबाजी दूर हो। आपसी एकता स्थापित हो और दो टुकड़ों में बंटे संगठन एक हो जायें। ताकि मान्यता समिति के लिये गुटों के बजाय संगठनों के प्रतिनिधि शामिल किये जायें।

लेकिन पत्रकार नेताओं ने खुद की सहमति से एक ही नाम की समिति के दो गुट सरकार के गजट में दर्ज करवा दिए। किसी समिति ने भी इस मसले पर पत्रकारों की बैठक नहीं बुलाई।

गुपचुप तरीके से एक समिति के दो फाड़ साबित करते हुए अलग-अलग नाम भेजे गये।

सभी संगठनों ने अपने संगठन /समिति की कार्यकारिणी की सहमति के बिना गुपचुप तरीके से शासन को नाम भेज दिये। यही नहीं पदाधिकारियों तक को पता भी नहीं था कि मान्यता समिति के लिए मनमाने तरीके से नाम भेज दिए गये हैं।

समितियों/संगठनों की कार्यकारिणी से जुड़े अधिकांश पत्रकारों की शिकायत है कि बिना बैठक के गुपचुप तरीके से और मनमाने ढ़ग से मान्यता समिति को नाम भेजे गये थे।

खैर ये तो तय है कि हमारे और आपके बीच पत्रकारों के बंटवारे के कुछ जिन्ना मौजूद हैं। और पत्रकारिता के सिद्धांतों की हत्या करने वाला गोडसे भी जिन्दा है।

# अगली कड़ी में :-

किन-किन विवादों से घिरे हैं ये संगठन /समितियां। पंजीकरण है या नहीं?

# कार्यकाल ही समाप्त हो चुका था। अवधि समाप्त हो जाने के बाद स्वत: भंग हो जाती है समिति। दो वर्ष के कार्यकाल के लिए हुआ था चुनाव। दो वर्ष गुजर गये थे। समिति के पदाधिकारियों के प्रमाण पत्र पर दर्ज है कार्यकाल की अवधि। जो समाप्त हो चुकी थी….

नवेद शिकोह (स्वामी नवेदानंद)

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