देश की सुरक्षा को लेकर बड़ी रणनीति के पीछे होते हैं पीएम मोदी के पसंदीदा ‘जेम्स बॉन्ड’

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जम्मू कश्मीर में राजनीतिक संकट आखिर भाजपा का गेम प्लान कैसे हैं, यही समझने के लिए यहां गठबंधन टूटने के मायने ढूंढे जा रहे हैं। ऐसे में डोभाल से शाह की मुलाकात से यही कयास लगाए जा रहे हैं कि दोनों की मुलाकात के बाद ही भारतीय जनता पार्टी ने जम्मू-कश्मीर में महबूबा सरकार से समर्थन वापस लेने का फैसला लिया है। ऐसा नहीं है कि यह कोई पहला मामला है जब एनएसए अजीत डोभाल रणनीतिक तौर पर सरकार के फैसले की वजह समझे जा रहे हैं। इससे पहले भी कई बार पीएम नरेंद्र मोदी को उन पर भरोसा करते देखा गया है।पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में घुसकर आंतकियों के कैपों को नष्ट करने के पूरे ऑपरेशन के पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का बड़ा हाथ है। गौरतलब हो कि पीओके में अंजाम दिए गए सर्जिकल ऑपरेशन की निगरानी रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और डीजीएमओ ले.जन. रनबीर सिंह कर रहे थे।

अजीत डोभाल अटल बिहारी वाजपेई के काफी भरोसेमंद माने जाते थे और अब प्रधानमंत्री मोदी के लिए भी काफी खास हो गए हैं। डोभाल जिस तरह से अपने इंटेलीजेंस ऑपरेशंस को अंजाम देते हैं, उसकी वजह से उन्हें कुछ लोगों ने भारत का ‘जेम्स बांड’ तक करार देना शुरू कर दिया था।

अजीत डोभाल के मार्गदर्शन में म्यामार में भी भारतीय सेना ने घुसकर उग्रवादियों को मौत की नींद सुला दिया था। देश की सुरक्षा में अजित डोभाल के योगदान के देखते हुए उन्हें हिंदुस्तान का ‘जेम्स बांड’ कहा जाता है। अजीत कुमार डोभाल, आई.पी.एस. (सेवानिवृत्त), भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं। वे 30 मई 2014 से इस पद पर हैं।

डोभाल भारत के पांचवे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं। अजीत डोभाल का जन्म 1945 में उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में एक गढ़वाली परिवार हुआ। उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा अजमेर के मिलिट्री स्कूल से पूरी की थी, इसके बाद उन्होंने आगरा विश्व विद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए किया और पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद वे आईपीएस की तैयारी में लग गए। वे केरल कैडर से 1968 में आईपीएस के लिए चुन लिए गए।

वे पाकिस्तान में सात सालों तक खुफिया जासूस की भूमिका में रह चुके हैं। पाकिस्तान में अंडर कवर एजेंट की भूमिका के बाद वे इस्लामाबाद में स्थित इंडियन हाई कमिशन के लिए काम किया। कांधार में आईसी-814 के अपहरण प्रकरण में अपहृत लोगों को सुरक्षित वापस लाने में अजीत की की अहम भूमिका रही थी। वे सबसे कम उम्र के पुलिस अफसर हैं जिन्हें विशेष सेवा के लिए पुलिस मेडल मिला है।

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अजीत न सिर्फ एक बेहतरीन खूफिया जासूस हैं बल्कि एक बढ़िया रणनीतिकार भी हैं। वे कश्मीरी अलगाववादियों जैसे यासिन मलिक, शब्बीर शाह के बीच भी उतने ही प्रसिद्ध हैं जितना कि भारत के आला अफसरों के बीच हैं।

पठानकोट ऑपरेशन के बाद मोदी सरकार में अजीत डोभाल के रुतबे और भूमिका पर सार्वजनिक बहस भी शुरू हो गई थी। 1969 बैच के केरल कॉडर के आईपीएस अधिकारी रहे डोभाल ने अपनी सेवा का अधिकतम समय खुफिया एजेंसी आईबी और रॉ में बिताया है। उन्हें खुफिया ऑपरेशनों का महारथी माना जाता है। मिजोरम में लालडेंगा से लेकर पंजाब में खालिस्तानी आतंकवादियों, जम्मू कश्मीर के उग्रवादियों और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों के मंसूबों को नाकाम करने वाले अभियानों के संचालन का श्रेय डोभाल को खुफिया जगत में दिया जाता है। उन्हें खुफिया एजेंसियों में मैन ऑफ दि ऑपरेशन के नाम से जाना जाता है।

वह न सिर्फ संघ के हिंदुत्ववादी राष्ट्रवादी विचारों के करीब हैं, बल्कि स्वभाव और कार्यशैली में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनका बहुत बेहतर तालमेल है। मोदी को अपने सभी अधिकारियों में सबसे ज्यादा भरोसा डोभाल पर ही है। इसलिए उनकी सरकार में वही भूमिका है जो वाजपेयी सरकार में तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्र की थी।

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