सरकार का रिपोर्ट कार्ड : चार वर्षों के दौरान ये रहीं सरकार की उपलब्धियां

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पीएम मोदी के नेतृत्व में बनी केंद्र की सरकार ने सफलतापूर्वक चार वर्ष पूरे कर लिए हैं। निश्चित तौर पर पार्टी से लेकर सरकार तक के लिए बेहद गर्व का विषय है कि इन चार वर्षों के दौरान सरकार पूरी तरह से बेदाग रही और इस दौरान विभिन्‍न राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में एक के बाद एक जीत भी हासिल करती रही। यही वजह है कि आज उसकी करीब 21 राज्‍यों में सरकार है। इस दौरान भाजपा पूरे देश में अपनी एक नई पहचान बना पाने में कामयाब रही है। इन चार वर्षों में सरकार ने विभिन्‍न मोर्चों पर काफी काम किया 

गांव व गरीब : अंतिम आदमी की सुध
रेटिंग 8/10

देश भी गांव से बनता है और राजनीति भी यहीं से खड़ी होती है। ऐसे में गांव व गरीब को लेकर केंद्र सरकार की सोच ने जो रफ्तार दिखाई है उसे सीधे तौर से राजनीति से ही जोड़ा जाता रहा है, लेकिन पहली बार यह भी स्पष्ट दिखा है कि अगर सरकार चाहे तो कल्याणकारी योजनाएं घर-घर और हा- हाथ पहुंचाई जा सकती है। फिर राज्य सरकार चाहे जो भी अडंगा लगाए। ग्रामीण बुनियादी ढांचे को मजबूत करने में जहां योजनाएं जमीनी स्तर पर दिखी हैं, वहीं गरीबों की झोली में सरकार की सब्सिडी सीधे पहुंची है। उसके सिर पर पक्की छत मिली है तो उसके साथ शौचालय और पीने के पानी की आपूर्ति भी हुई। उसकी रसोई तक राशन का सस्ता अनाज भी पहुंचाने में कामयाबी मिली। गोबर के कंडे के धुएं में खाना पकाने की मजबूरी से उज्ज्वला ने राहत दिलाई तो देश का हर गांव ही “सौभाग्य” शाली नहीं रहा बल्कि हर घर बिजली से जगमगाने की राह दिख रही है। हालांकि आदर्शग्राम की सोच पूरी नहीं हो पाई। लेकिन यह सुनिशिचत हो गया है कि बिजली, जनधन, उजाला, स्वास्थ्यबीमा, टीकाकरण जैसी सात योजनाएं हर गांव के हर परिवार तक पहुंचाया जाए।

कूटनीति : आक्रामक व दमदार
रेटिंग 8/10

पहले पिछले एक महीने पर गौर कीजिए- चीनी व रूसी राष्ट्रपति के साथ अनौपचारिक बातचीत, 20 वर्षों बाद भारतीय विदेश मंत्री का उत्तर कोरिया भेजा जाना..। यह तेवर और रुख तब है जब अगले साल चुनाव है और परंपरागत तौर पर केंद्र सरकार अपने कार्यकाल के अंतिम एक-दो साल में कूटनीति के लिहाज से काफी सुस्त दिखती है। अब याद कीजिए मई 2014 का वह पल जब मोदी सरकार के शपथग्रहण में सभी सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्ष व प्रतिनिधि मौजूद थे। संदेह की गुंजाइश नहीं बचती है कि मोदी सरकार की प्राथिमकता सूची में विदेश नीति का क्या स्थान है। अब एक नजर मोदी सरकार के अगले कुछ महीनों के एजेंडे पर डालिए…समुद्री मार्ग से पीएम मोदी इंडोनेशिया जाएंगे, अगले चार महीनों में एससीओ, जी-20, बिक्स में भारत की अगुवाई करेंगे। वैश्विक कूटनीति जिस मुकाम पर है वहां भारत की तरफ से ऐसी ही आक्रामक पहल की जरुरत है। और खुद प्रधानमंत्री के स्तर से बार बार यह संदेश भी दिया गया कि भारत की नजर में हर छोटे बड़े देशकी इज्जत है। सम्मान बराबरी से दिया जाएगा, शर्त है कि वह दोतरफा हो। यही नीति है कि भारत वैश्विक मंच पर किसी से भी आंख मिलाकर बात करने की क्षमता हासिल कर चुका है। यह सच है कि लाख कोशिशों के बावजूद पाकिस्तान के साथ संबंध नहीं सुधर पाए हैं लेकिन यह भी उतना ही सच है कि भारत बातचीत के लिए भी तैयार है तो ईंट का जवाब पत्थर से देने से भी चूकने को तैयार नहीं है। एक बात और, पूरी दुनिया में बसे भारतीयों में जरुरत पडऩे पर बेधड़क विदेश मंत्रालय के दरवाजे पर दस्तक देने का विश्वास भी जगा है।

बुनियादी ढांचा : निर्णय की झलक
रेटिंग : 7.5/10

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चार साल पहले कोई बैंक सड़क परियोजनाओं के लिए कर्ज देने को तैयार नहीं था। भूमि अधिग्रहण और वन व पर्यावरण मंजूरी के लफड़ों के चलते तकरीबन सवा सौ राजमार्ग परियोजनाएं अटकी हुई थीं। मोदी सरकार ने इसे चुनौती के रूप में लिया और बैंकों तथा निवेशकों के साथ बात कर अस्सी परियोजनाओं पर फिर से काम शुरू करा दिया। यही नहीं, नई परियोजनाओं के प्रति निवेशकों और वित्तीय संस्थाओं में आकर्षण पैदा करने के लिए परियोजनाओं के नए और अपेक्षाकृत सुविधाजनक मॉडल पेश किए। वन मंजूरी को समयबद्ध करने के साथ-साथ भूमि अधिग्रहण के लिए मुआवजे की दरें बढ़ा दी गईं। नतीजा यह हुआ कि सड़क निर्माण की रफ्तार लगभग दो गुनी हो गई है और देश की सड़कें पहले से ज्यादा लंबी, चौड़ी और बेहतर दिखाई देने लगी हैं। रेलवे लाइनों के निर्माण में भी नए कीर्तिमान बनते दिखाई रहे हैं। भले ही लोगों को इसका लाभ मिलने में अभी कुछ वक्त और लगेगा। रीजनल कनेक्टिविटी स्कीम ‘उड़ान से कई छोटे हवाई अड्डों का हुलिया बदलने की भूमिका तैयार हो चुकी है।

भ्रष्टाचार : बड़ी कोशिश पर चुभन बरकरार
रेटिंग : 7/10

भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर सत्ता में आई मोदी सरकार पिछले चार सालों में ऊंचे स्तर पर भ्रष्टाचार खत्म करने में काफी हद तक सफल रही है। पहली बैठक में कालेधन के खिलाफ एसआइटी के गठन का फैसला करने वाला मोदी मंत्रिमंडल भ्रष्टाचार के आरोपों से बेदाग रहा है। देश-विदेश में पड़े कालेधन को निकालने और आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए सरकार ने कई कड़े कानून बनाने के साथ-साथ नोटबंदी जैसा बड़ा फैसला भी लिया। 28 साल बाद बेनामी संपत्ति कानून लागू कर सरकार ने अपनी मंशा साफ कर दी। ई-गर्वनेंस के जरिए कोशिश हुई कि जो शीर्ष पर दिख रहा है वह जमीन तक पहुंचे। लेकिन आम आदमी को रोजमर्रा के जीवन में भ्रष्टाचार से राहत अभी तक नहीं मिली है। बिजली, सड़क, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी जरूरी सेवाएं भ्रष्टाचार के गिरफ्त में हैं। वैसे हकीकत का दूसरा पहलू यह भी है, ये सभी सेवाएं केंद्र नहीं, राज्य सरकारों के अधीन आती है और राज्यों में भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने और उसके खिलाफ कार्रवाई करने का कोई तंत्र है ही नहीं। लेकिन यह यक्ष प्रश्न बरकरार है कि भ्रष्टाचार अगर राष्ट्रीय मुद्दा भी है और चुनावी स्लोगन भी तो इससे राष्ट्रीय स्तर पर निपटने के लिए तंत्र कौन बनाएगा। अगर केंद्रीय योजनाओं को भी भ्रष्टाचार का दीमक चाट रहा है तो जिम्मेवारी क्या केवल राज्यों के सिर फोड़ी जा सकती है।

महंगाई: जीवन शैली का बोझ
रेटिंग 6.5/10

ऐसा तो कोई विरला ही मिले जो कभी भी महंगाई को लेकर संतुष्ट हो। अगर महंगाई चुनावी मुद्दा भी रहा हो तब तो खैर यह ज्वलनशील विषय है। ऐसे में पिछले चार साल में केंद्र सरकार ने इस पर लगाम लगाकर रखने में सफलता पाई है। महंगाई दर नियंत्रित रही है। कई पल आए जब थोक मूल्य निगेटिव में रहा। पर बावजूद इसके बटुए पर बोझ घटाये नहीं घटा। महंगाई ने रास्ता बदल लिया है, जिसकी चुभन अभी बरकरार हैं। रसोई घर में आम जरूरत की चीजों पर महंगाई का प्रभाव भले ही बहुत ज्यादा न रहा हो, लेकिन खाने की थाली से प्रोटीन वाले व्यंजन मीट, मछली, अंडा, पोल्ट्री उत्पाद बाहर होने लगे हैं। इसके अलावा अन्य आवश्यकताओं और सेवाओं का महंगा होना लोगों की मुश्किलें बढ़ाता रहा है। बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, मकान का किराया और मनोरंजन का बोझ नियंत्रण से बाहर दिखा। पूरे क्रम में समय समय पर कुछ उपाय हुए लेकिन वह बेअसर रहे। वहीं अन्य क्षेत्रों में बड़े साहसिक कदम उठाने वाली सरकार भी महंगाई को लेकर कुछ नया सोच नहीं दिखा पाई।

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