
चिकित्सा जगत में तकनीक ने एक और बड़ी छलांग लगाई है। स्वीडन में हुए एक व्यापक अध्ययन से यह साबित हुआ है कि स्तन कैंसर (Breast Cancer) की स्क्रीनिंग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल न सिर्फ सुरक्षित है, बल्कि यह पारंपरिक तरीकों से कहीं अधिक प्रभावी भी है।
‘द लैंसेट’ पत्रिका में प्रकाशित 2023 के नतीजों ने दुनिया भर के डॉक्टरों और शोधकर्ताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा है। आइए जानते हैं कि इस शोध में क्या खास मिला और यह भविष्य के लिए क्यों महत्वपूर्ण है।
एआई बनाम मानक स्क्रीनिंग
स्वीडन के राष्ट्रीय स्तन कैंसर स्क्रीनिंग कार्यक्रम के तहत किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि एआई-समर्थित मैमोग्राफी, सामान्य मैमोग्राफी की तुलना में ज्यादा सटीक नतीजे देती है। सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि एआई के उपयोग से मानक स्क्रीनिंग के मुकाबले 20 प्रतिशत अधिक कैंसर मामलों का पता चला।
यह अध्ययन अप्रैल 2021 से दिसंबर 2022 के बीच किया गया था, जिसमें 1,05,900 से अधिक महिलाओं ने हिस्सा लिया। इन्हें रैंडम तरीके से दो समूहों में बांटा गया था- एक समूह की जांच एआई की मदद से हुई और दूसरे की मानक डबल रीडिंग (रेडियोलॉजिस्ट द्वारा) से।
रेडियोलॉजिस्ट का काम हुआ आधा
इस तकनीक का एक और बड़ा फायदा डॉक्टरों के कार्यभार में कमी आना है। शोध में पाया गया कि एआई की मदद लेने से रेडियोलॉजिस्ट का स्क्रीन रीडिंग का काम 44 प्रतिशत तक कम हो गया। लुंड विश्वविद्यालय की डॉ. क्रिस्टिना लैंग (क्लीनिकल शोधकर्ता) ने बताया कि यह अपनी तरह का पहला रैंडम नियंत्रित परीक्षण है। एआई की मदद से कैंसर के आक्रामक प्रकारों को भी शुरुआती चरण में पकड़ने में मदद मिलती है, जिससे समय रहते इलाज संभव हो पाता है।
क्या है ‘इंटरवल कैंसर’ और एआई का असर?
‘इंटरवल कैंसर’ वह कैंसर है जो दो तय स्क्रीनिंग टेस्ट के बीच के समय में सामने आता है (यानी पिछला टेस्ट नेगेटिव था, लेकिन अगले चेक-अप से पहले बीमारी का पता चला)।
एआई ग्रुप: प्रति 1,000 महिलाओं में 1.55 इंटरवल कैंसर मिले
मानक ग्रुप: प्रति 1,000 महिलाओं में 1.76 इंटरवल कैंसर मिले
इसका मतलब है कि एआई के इस्तेमाल से इंटरवल कैंसर के निदान में 12 प्रतिशत की कमी आई, जो यह दर्शाता है कि एआई ने स्क्रीनिंग के दौरान ही बीमारी को पकड़ लिया था। साथ ही, दोनों समूहों में ‘झूठे पॉजिटिव’ रिजल्ट की दर लगभग समान रही।
भारत के लिए राह कितनी आसान?
हालांकि स्वीडन के नतीजे उत्साहजनक हैं, लेकिन भारत के संदर्भ में चुनौतियां अलग हैं।
बुनियादी ढांचे में अंतर: भारत में स्वीडन की तरह राष्ट्रीय स्तर पर कोई संगठित जनसंख्या आधारित स्क्रीनिंग सिस्टम नहीं है।
क्वालिटी में असमानता: मुंबई के बड़े अस्पतालों और बिहार के ग्रामीण अस्पतालों में इमेज क्वालिटी और मशीनों में जमीन-आसमान का फर्क है। एआई को भारत में लागू करने के लिए उपकरणों के मानकीकरण की जरूरत होगी।
डेटा की कमी: स्वीडन में एक मजबूत ‘कैंसर रजिस्ट्री सिस्टम’ है जो मरीजों को ट्रैक करता है। भारत में ऐसे फॉलो-अप सिस्टम की कमी है। इसके बिना यह पता लगाना मुश्किल होगा कि क्या एआई से कोई केस छूट रहा है।
एआई समर्थित मैमोग्राफी स्तन कैंसर स्क्रीनिंग के भविष्य को बदलने की क्षमता रखती है। यह न केवल ज्यादा केस पकड़ सकती है बल्कि रेडियोलॉजिस्ट पर से काम का बोझ भी हल्का कर सकती है। हालांकि, इसे हर देश की स्वास्थ्य व्यवस्था के अनुसार ढालना एक बड़ी चुनौती होगी।