विश्व एड्स दिवस पर दूर करें इस बीमारी से जुड़ी 3 मिथक

हर साल 1 दिसंबर को दुनिया वर्ल्ड एड्स डे मनाती है। जी हां, एक ऐसा दिन जो न सिर्फ एचआईवी/एड्स से जुड़ी जागरूकता बढ़ाने के लिए जरूरी है, बल्कि उन लोगों के प्रति समर्थन जताने का भी मौका है, जो इस संक्रमण के साथ जीवन जी रहे हैं। इस दिन का असली मकसद है लोगों को एचआईवी/एड्स के बारे में सही जानकारी देना, टेस्टिंग के महत्व को समझाना और इलाज की उपलब्धता के बारे में जागरूक करना। आज भी कई मिथक और गलतफहमियां लोगों के मन में मौजूद हैं, जो एड्स को खत्म करने के वैश्विक लक्ष्य को पूरा करने में बड़ी बाधा बनती हैं। बता दें, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 2030 तक एड्स को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा न रहने देने का लक्ष्य रखा है, लेकिन डर और गलत जानकारी के कारण एचआईवी से जुड़े कई मिथक आज भी समाज में मौजूद हैं। इसी वजह से वर्ल्ड एड्स डे 2025 पर इन मिथकों की सच्चाई जानना बेहद जरूरी है। वर्ल्ड एड्स डे 2025 की थीम इस साल वर्ल्ड एड्स डे “Overcoming disruption, transforming the AIDS response” थीम के साथ मनाया जा रहा है, जो बताती है कि एड्स से जुड़ी शर्म, डर और सामाजिक दूरी को खत्म करना कितना जरूरी है। कई दशकों से “एचआईवी पॉजिटिव” टैग के साथ गहरे तौर पर जुड़ी कलंक की भावना लोगों के जीवन को प्रभावित करती रही है। यह कलंक इसलिए भी बना रहता है क्योंकि अब भी बहुत से लोग नहीं जानते कि एचआईवी शरीर को कैसे प्रभावित करता है, कैसे फैलता है और किन तरीकों से इसका इलाज संभव है। एचआईवी को सही तरह से समझना है जरूरी मिथक 1: एचआईवी और एड्स एक ही चीज हैं यह सबसे बड़ी गलतफहमी है। एचआईवी एक वायरस है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली पर हमला करता है और उसे कमजोर बनाता है। वहीं, दूसरी ओर एड्स एचआईवी संक्रमण का अंतिम चरण है, जो तभी होता है जब एचआईवी का इलाज न किया जाए और इम्यून सिस्टम जरूरत से ज्यादा कमजोर हो जाए। आज विज्ञान की प्रगति के कारण एचआईवी पॉजिटिव होना एड्स का पर्याय नहीं है। सही इलाज और समय पर थेरेपी के साथ एचआईवी को एक लंबे समय तक नियंत्रित रखा जा सकता है। कुछ लोगों में वायरस शरीर में मौजूद रहता है, लेकिन अपनी प्रतिकृति नहीं बनाता- इसे डॉरमेंट या निष्क्रिय अवस्था कहा जाता है। यह स्थिति आधुनिक एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी के लिए भी चुनौतीपूर्ण है। मिथक 2: एचआईवी पॉजिटिव होने का मतलब जीवन खत्म यह सोच अब पुरानी और वैज्ञानिक रूप से गलत है। 1980 और शुरुआती 1990 के दशक में एचआईवी से संक्रमित लोगों के लिए स्थिति बहुत मुश्किल थी, जिसके कारण यह मिथक पैदा हुआ, लेकिन आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। एचआईवी पॉजिटिव लोग एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (ART) के सहारे बिल्कुल सामान्य जीवन जी सकते हैं। एचआईवी को अब एक क्रॉनिक हेल्थ कंडीशन की तरह माना जाता है, जैसे डायबिटीज या ब्लड प्रेशर। समय पर इलाज और नियमित दवाओं से व्यक्ति लॉन्ग, हेल्दी और एक्टिव लाइफ जी सकता है। मिथक 3: सामान्य संपर्क से एचआईवी फैल जाता है यह भी एक आम गलतफहमी है। एचआईवी न तो हवा से फैलता है, न थूक से और न ही किसी साधारण संपर्क से। हाथ मिलाना गले लगना साथ बैठना एक ही बाथरूम का इस्तेमाल एक ही गिलास से पानी पीना दरवाजे की कुंडी छूना खाना शेयर करना इनमें से किसी से भी एचआईवी नहीं फैलता। एचआईवी को फैलने के लिए कुछ खास बॉडी फ्लूड्स की जरूरत होती है और वायरस शरीर के बाहर बहुत देर तक जीवित नहीं रह पाता। इसका इन्फेक्शन आमतौर पर अनप्रोटेक्टेड सेक्स या इन्फेक्टेड सुई के संपर्क से फैलता है। एचआईवी और एड्स से जुड़े जरूरी फैक्ट्स अगर कोई व्यक्ति अपनी ART दवाएं समय पर और नियमित रूप से लेता है, तो शरीर में वायरस की मात्रा इतनी कम हो जाती है कि लैब टेस्ट भी उसे पकड़ नहीं पाते। 2019 की एक मेडिकल शोध के अनुसार, अंडिटेक्टेबल एचआईवी दूसरों को फैल नहीं सकता। इसका मतलब है कि सही इलाज न सिर्फ मरीज को हेल्दी रखता है बल्कि इन्फेक्शन को फैलने से भी रोकता है। पहले से कहीं ज्यादा आसान है रोकथाम एचआईवी-नेगेटिव व्यक्तियों के लिए आज प्रभावी दवाएं उपलब्ध हैं: PrEP इसे नियमित रूप से लिया जाता है ताकि संक्रमण का जोखिम कम हो। PEP इसे एचआईवी के संभावित संपर्क के 72 घंटों के भीतर शुरू किया जाता है और 28 दिन तक लिया जाता है। यह वायरस को शरीर में स्थापित होने से रोकता है। इन दवाओं ने एचआईवी की रोकथाम को पहले से कहीं ज्यादा आसान बना दिया है। एचआईवी/एड्स को लेकर लोगों के मन में मौजूद मिथक और डर आज भी सबसे बड़ी चुनौती हैं। वैज्ञानिक शोध और आधुनिक चिकित्सा ने इस संक्रमण को पूरी तरह मैनेजेबल बना दिया है, लेकिन समाज में फैली गलत धारणाओं को मिटाना अब भी जरूरी है।
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