तमाम दावों के बावजूद राज्य में नहीं रुक रहा मानव-वन्यजीव के संघर्षों का सिलसिला

तमाम दावों के बावजूद राज्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। अब देहरादून के प्रसिद्ध पिकनिक स्पाट मालदेवता के पास हाथी ने एक युवक को मार डाला। युवक दोस्तों के साथ वहां गया था। प्रदेश में इस वर्ष अब तक हाथी के हमलों में सात लोग जान गंवा चुके हैं, जबकि आठ घायल हो गए। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार यह इलाका एलीफेंट कारीडोर का हिस्सा है और यहां हाथियों की सक्रियता बनी रहती है।

इन दिनों यहां घूम रहे झुंड में एक हथिनी गर्भवती है। वन्य जीव विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे में हाथियों के स्वभाव में आक्रामकता आ जाती है। मंथन का विषय यह है कि प्रदेश में ऐसे हादसों में वृद्धि क्यों हो रही है। देहरादून जिले को देखें तो यहां का एक बड़ा भूभाग वनों से घिरा है। इसका कुछ हिस्सा राजाजी नेशनल पार्क से भी सटा है। दून के कुछ लोकप्रिय पर्यटक स्थल जंगल के आसपास हैं। इनमें मालदेवता, लच्छीवाला, डाकपत्थर के निकट यमुना का किनारा आदि ऐसी जगह शामिल हैं, जहां पर्यटकों की खूब आवाजाही रहती है। इन इलाकों की एक और विशेषता है कि ये हाथियों के साथ ही अन्य वन्य प्राणियों की सैरगाह भी हैं। ऐसे में हादसों की आशंका बढ़ जाती है। रविवार को मालदेवता के पास जहां हादसा हुआ, उस इलाके में हाथियों को कई बार देखा गया है, हालांकि इससे पहले झुंड ने कभी किसी पर हमला नहीं किया था। यह पहली बार है जब इस क्षेत्र में हाथियों के हमले की बात सामने आई है।

समस्या अकेले देहरादून की ही नहीं, ऋषिकेश, कोटद्वार और नैनीताल के रामनगर में भी हालात कुछ इसी तरह के हैं। संरक्षित क्षेत्रों में पर्यटन को प्रोत्साहित कर रहा पार्क प्रशासन सैलानियों की सुरक्षा का भी ध्यान रखता है। इन इलाकों में सैलानी गाइड के साथ ही जाते हैं, लेकिन संरक्षित क्षेत्रों से बाहर सुरक्षा को लेकर ऐसी गंभीरता नहीं दिखाई देती। गौर करने लायक तथ्य यही है कि सुरक्षा और सजगता की सर्वाधिक जरूरत वन क्षेत्रों से सटे पर्यटन स्थल और वहां से गुजरने वाले मार्गो पर ही है। ऋषिकेश के पास हुए हादसों को उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है। यहां ज्यादातर लोगों की जान हाईवे पर गई है। उत्तराखंड में कुमाऊं में शारदा नदी से लेकर गढ़वाल मंडल में यमुना के तट तक 6500 वर्ग किमी का इलाका हाथियों की पनाहगाह मानी जाती है। सदियों से ये प्राणी इस क्षेत्र में विचर रहे हैं, लेकिन अब उनके पारंपरिक रास्ते नजर नहीं आते। प्रदेश 11 पारंपरिक गलियारों को लेकर उच्च न्यायालय भी चिंता जाहिर कर चुका है। जाहिर है सुरक्षा और सजगता के लिए पहल सिस्टम को ही करनी होगी।

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