
भोपाल में सिंहस्थ और नर्मदा परियोजना की समीक्षा बैठक के दौरान मुख्यमंत्री मोहन यादव ने शिप्रा नदी के नाम को लेकर अधिकारियों की प्रस्तुति में सुधार कराया। उन्होंने कहा कि नदी का मूल और प्रामाणिक नाम ‘शिप्रा’ है तथा सरकारी अभिलेखों में इसी नाम का उपयोग किया जाना चाहिए।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने गुरुवार को नर्मदा नदी परियोजना और सिंहस्थ की तैयारियों की समीक्षा बैठक के दौरान शिप्रा नदी के नाम को लेकर अधिकारियों को महत्वपूर्ण जानकारी दी। प्रस्तुतीकरण में नदी का नाम “क्षिप्रा” लिखा गया था, जिसे देखते ही मुख्यमंत्री ने आपत्ति जताते हुए कहा कि नदी का वास्तविक और प्रामाणिक नाम “शिप्रा” है और सरकारी दस्तावेजों में इसी नाम का उपयोग किया जाना चाहिए।
बैठक के दौरान अधिकारियों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का हवाला देते हुए बताया कि कई स्रोतों में नदी का नाम “क्षिप्रा” भी दर्ज है। इस पर मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से कहा कि केवल एआई या इंटरनेट पर निर्भर रहने के बजाय महाकवि कालिदास के ‘मेघदूतम्’ और वैदिक ग्रंथों का भी अध्ययन किया जाए, जहां नदी के मूल नाम का उल्लेख मिलता है।
इसके बाद अधिकारियों ने दोबारा एआई के माध्यम से जानकारी की पुष्टि की। पुनः जांच में एआई ने भी माना कि नदी का मूल और सही नाम “शिप्रा” है तथा पहले दी गई जानकारी पूरी तरह सटीक नहीं थी। मुख्यमंत्री ने बैठक में बताया कि “क्षिप्र” शब्द का अर्थ होता है तेज गति से चलने वाला, जबकि “शिप्रा” का अर्थ शांत और सौम्य प्रवाह वाली नदी है। उन्होंने कहा कि शिप्रा अपने शांत स्वभाव के लिए जानी जाती है और सामान्य परिस्थितियों में इसका प्रवाह बेहद सहज रहता है।
बता दें कि उज्जैन में आम बोलचाल में “शिप्रा” और “क्षिप्रा” दोनों नाम प्रचलित हैं। वर्ष 2016 के सिंहस्थ से पहले भी नदी के वास्तविक नाम को लेकर बहस छिड़ी थी। उस समय भी प्रशासनिक स्तर पर दोनों नामों को लेकर अलग-अलग मत सामने आए थे। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि “शिप्रा” ही नदी का मूल और प्रामाणिक नाम है, जबकि “क्षिप्रा” को बाद में प्रचलित हुआ रूप माना जाता है।