टीबी पर स्वास्थ्य संचार सुदृढीकरण कार्यशाला आयोजित

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  • सैंपल कलेक्शन में मदद करेगा पोस्टल विभाग
  • लखनऊ समेत चार जिलों में विभाग से हुआ करार
  • टीबी के मिसिंग केसेज को चिन्हित करने पर ज़ोर
  • एसीएफ के जरिये तलाशे गए 20 हजार टीबी मरीज
  • प्राइवेट सेक्टर से मरीजों का नोटिफिकेशन 77 फीसद बढ़ा
  • सीबीनाट मशीन से जांच की सुविधा से इलाज में आई तेजी
  • निक्षय पोषण योजना के तहत हुआ 50 करोड़ का भुगतान

लखनऊ, 11 जून 2019. राज्य क्षय रोग अधिकारी डॉ॰ संतोष गुप्ता ने देश से सन 2025 तक क्षय रोग (टीबी) के पूरी तरह से खात्मे के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संकल्प को तय समय सीमा से पहले पूरा करने के लिए प्रदेश में चलाये जा रहे कार्यक्रमों और योजनाओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होने कहा कि टीबी के मिसिंग केसेज को जल्द से जल्द चिन्हित करने के साथ ही उन्हें नोटिफ़ाई करने पर उनका पूरा ज़ोर है। देश में करीब एक मिलियन मिसिंग केसेज हैं, जो कि कहीं नोटिफ़ाई नहीं हैं। इसके साथ ही टीबी मरीजों के बलगम के नमूनों की जल्द से जल्द जांच हो सके, इसके लिए पोस्टल डिपार्टमेन्ट का भी सहयोग लेने की योजना है, जो कि दूरदराज़ के सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों से नमूनों को जिला अस्पताल तक लाने में मदद करेंगे। शुरुआत में प्रदेश के चार जिलों बदायूं, चंदौली, आगरा और लखनऊ में यह योजना शुरू की जा रही है।

यह बात डॉ गुप्ता ने “टीबी से जंग-पोषण के संग” विषय पर मंगलवार को यहाँ एक स्थानीय होटल में स्वास्थ्य विभाग और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तत्वावधान में सेंटर फॉर एडवोकेसी एंड रिसर्च (सीफार) के सहयोग से स्वास्थ्य संचार सुदृढीकरण कार्यशाला में कही । डॉ॰ गुप्ता ने कहा कि पिछले साल तक के आंकड़े बताते हैं कि देश में करीब एक मिलियन मिसिंग केसेज हैं। इसके लिए पूरे प्रदेश में समय-सनय पर सक्रिय टीबी रोगी खोज अभियान (Active Case Finding) चलाये जा रहे हैं। अब तक चलाये गए तीन चरणों में करीब 20 हजार नए केसेज चिन्हित किए गए हैं। इस बार 10 जून से 22 जून तक चलाये जा रहे अभियान के दौरान 7000 नए केस चिन्हित करने का लक्ष्य है। 10 जून से शुरू हुए अभियान की मानिटरिंग भी कराई जा रही है, 40 जिलों में इसके लिए राज्य से भी टीम भेजी गयी हैं। इसके अलावा पाँच मेडिकल मोबाइल वैन भी चलायी जा रहीं हैं, जिनके जरिये 1110 केस चिन्हित किए गए हैं, जिनमें 122 एमडीआर केस पाये गए हैं।

इसके तहत स्वास्थ्य विभाग टीबी के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों में घर-घर टीम को भेजकर मरीजों की खोज कर रही है और जिनमें भी टीबी के लक्षण प्रथमदृष्ट्या नजर आ रहे हैं, उनके नमूने लेकर जांच को भेज रही है। जांच में जिसमें भी टीबी पायी जाती है, उनका तत्काल इलाज शुरू किया जाता है। उन्होने कहा कि टीबी की जांच के लिए सीबीनाट मशीन के आ जाने से मरीजों की जांच रिपोर्ट दो घंटे में मिल जा रही है। अब तक प्रदेश में 141 सीबीनाट मशीन काम कर रहीं हैं। इसके जरिये अप्रैल 2018 तक जहां 21542 लोगों के नमूने जाँचे गए थे वहीं अप्रैल 2019 तक 34434 नमूनों की जांच हुई । इस तरह इसमें 60 फीसद की बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी है। टीबी मरीजों के नोटिफ़िकेशन में सन 2018 में करीब 36 फीसद का इजाफा हुआ है। सन 2017 में जहां करीब 3.09 लाख टीबी मरीज नोटिफ़ाई हुए थे वहीं सन 2018 में करीब 4.22 लाख मरीज नोटिफ़ाई हुए। प्राइवेट सेक्टर में भी नोटिफ़िकेशन करीब 77 फीसद बढ़ा है। सन 2017 में प्राइवेट सेक्टर से जहां करीब 67000 टीबी मरीज चिन्हित हुए थे वहीं सन 2018 में 1.19 लाख मरीज नोटिफ़ाई हुए। इस साल जनवरी से अब तक प्राइवेट सेक्टर में करीब 52000 मरीज नोटिफ़ाई किए जा चुके हैं। इसके अलावा निक्षय पोषण योजना भी बहुत ही कारगर साबित हो रही है।

इसके तहत टीबी मरीजों को इलाज के दौरान 500 रुपए प्रतिमाह दिये जा रहे हैं ताकि वह इलाज के दौरान दवा के साथ पौष्टिक आहार भी ले सकें। इसके तहत टीबी मरीजों के खातों में करीब 50 करोड़ का भुगतान किया जा चुका है। आईएमए और अन्य संगठनों की भी मदद प्रदेश में ली जा रही है। गैस अथारिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (गेल) फिरोजाबाद में टीबी मरीजों के लिए चल रहे कार्यक्रमों में मदद कर रही है। शहरी क्षेत्रों में नयी लैब भी स्थापित की जा रहीं हैं जो कि कल्चर एंड ड्रग सेंसिटिविटी की जांच करेंगी।

इस तरह का एक लैब मेरठ में काम करना शुरू कर दिया है। गोरखपुर में भी इस तरह की लैब जल्द ही काम शुरू कर देगी । बेड़ाकुलीन नामक नयी दवा भी टीबी के इलाज में कारगर साबित होगी। इसके लिए 18 स्थानों पर नोडल डीआरटीबी सेंटर बनाए गए हैं। इस तरह केंद्र सरकार के संकल्प को समय सीमा के भीतर पूरा करने के लिए उत्तर प्रदेश पूरी तरह तैयार है ।

कार्यशाला के मुख्य वक्ता पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट, दिल्ली के पूर्व निदेशक व नेशनल टीबी टास्क फोर्स के वॉइस चेयरमैन डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद ने वैश्विक और भारतीय परिवेश में टीबी की स्थिति पर प्रकाश डाला। उन्होने भी वर्ष 2025 तक टीबी के खात्मे में मिसिंग केसेज को बड़ी चुनौती के रूप में बताया। उन्होने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर भी इस चुनौती से निपटने की पूरी तैयारी चल रही है।

इसके अलावा मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट (एमडीआर) और एक्सट्रीमली ड्रग रेजिस्टेंट (एक्सडीआर) टीबी के मरीजों की बढ़ती तादाद पर काबू पाना भी एक चुनौती है, क्योंकि इसके मामले हर साल बढ़ रहे हैं। उन्होने कहा कि भारत में होने वाली मौतों का प्रमुख कारण टीबी है। सन 2015 के आंकड़ों पर नजर डालें तो विश्व में करीब 10.4 मिलियन नए लोग संक्रमण के शिकार हुए जिनमें 1॰ 8 मिलियन टीबी रोगियों की मौत हो गयी। उसी दौरान भारत में 2॰8 मिलियन लोग लोग संक्रमण की चपेट में आए जिनमें से 0॰ 48 मिलियन मरीजों की मौत हो गयी।

इस अवसर पर उत्तर प्रदेश क्षय नियंत्रण टास्क फोर्स (RNTCP) के चेयरमैन व र्किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के पल्मोनरी मेडिसिन के विभागाध्यक्ष डॉ॰ सूर्यकांत ने कहा कि टीबी एक संक्रामक रोग है जो कि माइक्रो बैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस से फैलता है। उन्होने कहा कि दुनिया में करीब दो बिलियन (200 करोड़) जबकि भारत में 50 करोड़ लोग टीबी से संक्रमित हैं किन्तु इन सभी को टीबी की सक्रिय बीमारी नहीं है। दुनिया में जहां सक्रिय टीबी रोगियों की तादाद एक करोड़ है वहीं भारत में यह संख्या करीब 28 लाख है।

अब सवाल यह उठता है कि हर संक्रमित को यह बीमारी क्यों नहीं हो रही, इसका प्रमुख कारण यह है कि जो व्यक्ति कुपोषण की जद में है उसी में सक्रिय टीबी होने की संभावना ज्यादा रहती है। इस प्रकार कह सकते हैं कि टीबी का मरीज होने के लिए बैक्टीरिया ही जिम्मेदार नहीं है, अगर व्यक्ति का पोषण और प्रतिरोधक क्षमता ठीक है तो टीबी का संक्रमण होने के बावजूद उसे सक्रिय टीबी की बीमारी नहीं होगी। सेंट्रल एवं एक्जीक्यूटिव कमेटी टीबी एसो॰ ऑफ इंडिया के सदस्य डॉ॰ सूर्यकांत ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सन 2025 तक टीबी के खात्मे के सपने को तब तक पूरा नहीं किया जा सकता है जब तक कि हम लोगों का पोषण नहीं सही करते। ज्ञात रहे कि देश और प्रदेश में पाँच साल से कम उम्र के आधे से अधिक बच्चे कुपोषण का शिकार हैं और फास्ट फूड और डाइटिंग प्रथा से लोगों का पोषण असंतुलित होता जा रहा है, जिससे टीबी को बढ़ावा मिल रहा है।

कार्यशाला में टीबी पर कार्य कर रही संस्था रीच, ममता, द यूनियन व जीत परियोजना के प्रतिनिधियों भी अपने अनुभव साझा किये ।

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