हरदोई से हुई थी होली की शुरुआत कभी हरि द्रोही नाम से जाना जाता था जिला

एंकर— होली का हरदोई से गहरा नाता है इसीलिए इस त्योहार के नजदीक आते ही जिले के इतिहास की यादें ताजा होने लगती हैं। हरदोई नगरी का नामकरण राजा हिरण्यकशिपु की नगरी के आधार पर ही होना कहा जाता है। कारण राजा हिरण्यकशिपु को हरि का द्रोही कहा जाता था। बतातें है कि पूर्व में हरदोई नगरी का नाम भी हरि द्रोही था। बाद में इसके संशोधित करके हरदोई किया गया। राजा हिरण्यकशिपु  की नगरी होने का प्रमाण आज भी शहर के सांडी रोड पर बने कई ऊंचे टीले साबित कर रहे हैं। जो किसी महाराजा की नगरी होने की बयां कर रहे हैं।

पुरातन काल की कथानुसार अपने भाई की मृत्यु का बदला लेने के लिए राक्षसराज हिरण्यकशिपु ने कठिन तपस्या करके ब्रह्माजी व शिवजी को प्रसन्न कर उनसे अजेय होने का वरदान प्राप्त कर लिया। वरदान प्राप्त करते ही वह प्रजा पर अत्याचार करने लगा और उन्हें यातनाएं और कष्ट देने लगा। जिससे प्रजा अत्यंत दुखी रहती थी। इन्हीं दिनों हिरण्यकशिपु की पत्नी कयाधु ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम प्रहलाद रखा गया। राक्षस कुल में जन्म लेने के बाद भी बचपन से ही श्री हरि भक्ति से प्रहलाद को गहरा लगाव था। हिरण्यकशिपु ने प्रहलाद का मन भगवद भक्ति से हटाने के लिए कई प्रयास किए, परन्तु वह सफल नहीं हो सका, यहां तक कि उसे अपनी बहन होलिका की गोद में बैठालकर प्रह्लाद को जलाने का षड्यंत्र भी रचा।

होलिका हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु नामक दैत्य की बहन और प्रह्लाद नामक विष्णु भक्त की बुआ थी उसको यह वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जलेगी। इस वरदान का लाभ उठाने के लिए विष्णु-विरोधी हिरण्यकशिपु ने उसे आज्ञा दी कि वह प्रह्लाद को लेकर अग्नि में प्रवेश कर जाए, जिससे प्रह्लाद की मृत्यु हो जाए। होलिका ने प्रह्लाद को लेकर अग्नि में प्रवेश किया। ईश्वर कृपा से प्रह्लाद बच गया और होलिका जल गई। होलिका के अंत की खुशी में होली का उत्सव मनाया जाता है।

इसके साथ ही सांडी रोड पर बने भक्त प्रहलाद घाट को लेकर कहा जाता है राजा हिरण्यकशिपु ने अपने बेटे की भक्ति से खफा होकर उसे अपने महल जो काफी ऊंचे टीले पर बना था से प्रहलाद को फेंक दिया था। जो इसी प्रहलाद घाट में गिरा इसके बावजूद प्रहलाद का बाल-बांका नहीं हुआ। अंततः एक दिन उसने प्रहलाद को तलवार से मारने का प्रयास किया, तब भगवान नरसिंह खम्भे से प्रकट हुए और हिरण्यकशिपु को अपने जांघों पर लेते हुए उसके सीने को अपने नाखूनों से फाड़ दिया और अपने भक्त की रक्षा की।

कहा जाता है कि हिरण्यकशिपु की मृत्यु के बाद नरसिंह भगवान  का क्रोध इतना प्रबल था कि हिरण्यकश्यपु को मार डालने के बाद भी कई दिनों तक वे क्रोधित रहे। अंत में, भगवती लक्ष्मी ने प्रह्लाद से सहायता मांगी और वह तब तक भगवान विष्णु का जप करता रहा जब तक कि वे शांत न हो गये। आज उन्हें हरदोई के सांडी रोड स्थित मंदिर में उन्हें शांत स्वरूप में देखा जा सकता है।
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