अपने लिए जगह तलाशने में लगा है समानांतर साहित्य महोत्सव

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 विश्व पुस्तक मेला खत्म हुआ तो लगा अब शायद साहित्य का उबाल कुछ दिन बैठा रहेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। एक तरफ जयपुर साहित्य महोत्सव फिजाओं में घूमने लगा तो दूसरी तरफ समानांतर साहित्य महोत्सव ने अपने लिए जगह तलाशने का प्रयास शुरू कर दिया। इन साहित्यिक उत्सवों के साथ एक और गतिविधि सोशल मीडिया पर दिखाई देने लगी। पुस्तक मेले में जिन लेखकों (अधिकांश युवा) की किताबों के विमोचन हुए थे वे लगातार अपनी किताबों का प्रचार और उन्हें बेचने का अलग-अलग तौर-तरीकों से प्रयास करते नजर आए। मसलन किसी ने लिखा, ‘एमेजॉन की 100 टॉप किताबों में उनकी किताब शामिल हो गई है तो किसी ने बड़े डिस्काउंट का लालच दिया।’ बहरहाल मकसद सबका एक ही था कि उनकी लिखी किताब पाठक खरीद ले।

यह प्रचार लगभग वैसा ही लगा जैसे कभी टूथपेस्ट का विज्ञापन सबसे पहले यह बताता था कि इसका इस्तेमाल लाखों लोग कर रहे हैं, इसलिए आप भी इसे इस्तेमाल कीजिए। यानी किताबों को टूथपेस्ट की तरह बेचने का प्रयास साफ तौर पर दिखाई दिया। ऐसा नहीं है कि प्रकाशकों द्वारा अलग-अलग रूपों में किताब बेचने के प्रयास नहीं किए गए। पहले भी पुस्तक मेलों में जाने-माने लेखकों को प्रकाशकों के स्टाल पर बिठा दिया जाता था और पाठकों को आमंत्रित किया जाता था कि वे अपने प्रिय लेखक की हस्ताक्षार युक्त प्रति खरीद सकते हैं। जावेद अख्तर की किताब ‘तरकश’ जब प्रकाशित हुई तो वह बाकायदा प्रकाशक के स्टाल पर थे। मगर बेहद गरिमा के साथ। बावजूद इसके उनकी 100 प्रतियां भी नहीं बिकीं।

सवाल है कि हिंदी के लेखक के सामने आखिर क्या मजबूरी है कि वह अपनी ही लिखी किताबों को सोशल मीडिया पर प्रचारित कर रहा है और बेच रहा है? प्रचार का काम प्रकाशकों का है, लेकिन हिंदी के प्रकाशकों की प्रचार में कभी कोई रुचि नहीं रही। इसलिए इसका बीड़ा भी हिंदी के ही लेखक (युवा) ने उठा लिया है। बेस्ट सेलर माने जाने वाले सत्य व्यास ने अपने पहले उपन्यास ‘बनारस टॉकीज’ को सोशल मीडिया पर खूब प्रचारित किया। हाल ही में उनका एक और उपन्यास आया ‘दिल्ली दरबार’। इस उपन्यास के आने से पहले ही सत्य व्यास ने किताब के प्रचार के लिए इलेस्ट्रेशंस की एक सीरीज जारी की। इसमें उपन्यास का नायक और अन्य पात्र अपने किरदारों के अनुसार चुटीले संवाद बोलते दिखाई पड़ते हैं। पाठकों ने इसे बेहद पसंद किया और उनके तीन किरदार किताब के बाजार में आने से पहले ही लोकप्रिय हो गए।

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जाहिर है इन किरदारों से आत्मीयता बढ़ाने के लिए लोगों ने किताब भी खरीदी होगी। ये प्रमोशन के नए तरीके हैं जिन्हें युवा हिंदी लेखक अपना रहा है। वह चाहता है कि जल्द से जल्द जाना-माना लेखक बन जाए। हिंदी प्रकाशन जगत का जो इतिहास रहा है, वह बताता है कि हमारे प्रकाशकों की किताबों के प्रचार में कोई रुचि नहीं है। वे शायद ही किताबों के प्रचार पर पैसा खर्च करते हों। तो लेखक क्यों अपनी लिखी किताबों के प्रचार उनकी बिक्री को लेकर सशंकित हो उठा है। इसकी बहुत सारी वजहें हैं। पहला, अब प्रकाशक ने किताब लिखने, प्रचारित करने और बेचने की जिम्मेदारी लेखकों पर डाल दी है। लेखक इसलिए भी यह जिम्मेदारी उठा रहा है क्योंकि अंतत: किताबों में पैसा भी बेचारा लेखक ही लगा रहा है। प्रकाशकों का सीधा सा तर्क होता है कि किताबें बिकती नहीं इसलिए वह क्यों पैसा निवेश करे।

जाहिर है ये नियम हर लेखक पर लागू नहीं होता। मगर यदि आप गौर से प्रकाशन जगत पर नजर डालेंगे तो पाएंगे कि तमाम ऐसे प्रकाशक बाजार में आ गए हैं जो आपसे सहयोग राशि लेकर किताबें प्रकाशित कर रहे हैं। यह कथित सहयोग राशि वास्तव में वह कीमत है जो किताब के छपने पर खर्च होती है। दिलचस्प बात है कि इसके बावजूद प्रकाशक खुद यह बताने लगा है कि बाजार में क्या बिकता है और क्या नहीं। 1990 में आर्थिक उदारीकरण के बाद प्रकाशकों ने सामूहिक स्वर में यह घोषणा कर दी थी कि कविताओं का बाजार नहीं है, लेकिन कविताएं आज भी छप और बिक रही हैं बल्कि उनका बाजार बढ़ा ही है। अब प्रकाशक यह कहने लगे हैं कि कहानी का बाजार नहीं है।

 
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